जो भी हुआ बहुत कम हुआ
मेरे तेरे दरमियाँ सफ़र ही कहाँ हुआ ।
लफ्जों की दूरियां बरसो बरस वहीँ रही
न मैं चला न तुम्हारा कदम उठाने का मन हुआ ॥
जो भी हुआ बहुत कम हुआ
मेरे तेरे दरमियाँ सफ़र ही कहाँ हुआ ।
लफ्जों की दूरियां बरसो बरस वहीँ रही
न मैं चला न तुम्हारा कदम उठाने का मन हुआ ॥

मेरी और एक हाथ
हाथ में अंगूठी और एक अंगुली में काला धागा
नज़र में ऐसा बसा है की हर पल रहे मेरे साथ
कुछ भी अगर चाहूँ तो कभी न वो मांगू
बस वो जाने कैसे जान जाए
मेरी एक आह पर दौडी चली आए
वो भी कहा सो पाती है अगर में रात को जागूँ
मेरे दुख मेरे सुख सब उससे हैं
पर मैं ऐसा कि उसकी आँखों के आँसू मुझसे है
स्नेह ,छाँव .प्यार, दया ,ममता सब उसमे समाते हैं,
पापा उसे आशीष कि माँ कहकर बुलाते हैं.



जब मैं सोया हुआ था
मैं
सच्चा था
अच्छा था
पाक था
साफ़ था
चहरे पर गुमान था
सबकी जान था
एक सुरूर था
आँखों का नूर था
पर जब से जगा हूँ
बेनूर हूँ
बेवज़ह का गुरूर हूँ
नापाक हूँ
बेजान हूँ
समझ नही आता
जागते ही मैं इतना बदल कैसे गया
ज़माने के लिए।
