Monday, January 12, 2009

न हुआ सफ़र

जो भी हुआ बहुत कम हुआ

मेरे तेरे दरमियाँ सफ़र ही कहाँ हुआ ।

लफ्जों की दूरियां बरसो बरस वहीँ रही

न मैं चला न तुम्हारा कदम उठाने का मन हुआ ॥

Wednesday, December 31, 2008

कही तो बस...सही सही


मैंने हर वक्त ..वक्त को अपने पास रखा
कभी जब नाराज़ भी हुआ
मुझसे कुछ उखडा
खफ़ा रहा
मैं तब भी मनाने में जुटा रहा ।
प्यार से
दुलार से
तकरार से।
मेरी हर कोशिश
उसे अपने पाले में करने की थी
कभी सफल हुआ
कभी निराशा हाथ लगी ।
खुशिया काफी
ग़म थोड़े कम
आशाएं बहुत ।
बस ऐसे ही वक्त को पीछे छोड़ कर
यादों को सीने में जोड़ कर
निकला हूँ कुछ नया पाने को
एक नया राग गाने को
वक्त नया
मैं वही
बस सब कुछ हो जाए
सही सही ॥
'आशीष'

Sunday, November 30, 2008

हिंदुस्तान हूँ मैं

विचलित हूँ मैं


भयभीत नही


रक्त से सना


आक्रांत चेहरों से भरा


सहमा ज़रूर हूँ


अडिग हूँ मैं.


लूटेरे नए नही है मेरे लिए


सदी दर सदी


साल दर साल


झेला है मैंने


कभी गेरों को


कभी अपनों को


कभी और भी ज़्यादा अपनों कों।


हर बूँद टपकने के साथ


और भी गाढ़ी होती गयी


हर हमले से उभरा हूँ मैं


कुछ देर के लिए थका ज़रूर हूँ


पर रूका नही हूँ मैं ।


कंधो में ज़ोर लिए


नयी दिशा की और लिए


मुझे


चले है वो, जिनकी मैं जान हूँ


मैं हिंदुस्तान हूँ।




















Saturday, November 8, 2008

meri maa


मेरी और एक हाथ


हाथ में अंगूठी और एक अंगुली में काला धागा


नज़र में ऐसा बसा है की हर पल रहे मेरे साथ


कुछ भी अगर चाहूँ तो कभी न वो मांगू


बस वो जाने कैसे जान जाए


मेरी एक आह पर दौडी चली आए


वो भी कहा सो पाती है अगर में रात को जागूँ


मेरे दुख मेरे सुख सब उससे हैं


पर मैं ऐसा कि उसकी आँखों के आँसू मुझसे है


स्नेह ,छाँव .प्यार, दया ,ममता सब उसमे समाते हैं,


पापा उसे आशीष कि माँ कहकर बुलाते हैं.



मैं चलूँ उडू फिरूं

हर उस रस्ते से गुजरू

जहाँ सपनों से मुलाक़ात हो

इच्छाओ के हो दिन

और ख्वाबों की रात हो

चाँद से हो नाता

और सितारों के रहूँ संग

ख़ुद ही बुनू सपने अपने

और ख़ुद ही भरूं उनमे रंग

काश की यह सब करने का मुझमे दम हो

ऐ खुदा ...ऐसे रास्ते पर मेरे यह क़दम हो ।

Friday, November 7, 2008

ख्वाबों के गुच्छे


जब भी मैंने गीत लिखे तो बोल तुझसे लिए ,

लेखनी से निकली जब भी कहानी कोई तो किरदार तुझसे लिए ।

तुझे मेरी ख़बर ही न रही ऐ 'बेखबर '

जब भी तोडी नींद की एक टहनी तो 'ख्वाबों के गुच्छे' चार तुझसे लिए।

Monday, August 18, 2008


जब मैं सोया हुआ था


मैं


सच्चा था


अच्छा था


पाक था


साफ़ था


चहरे पर गुमान था


सबकी जान था


एक सुरूर था


आँखों का नूर था


पर जब से जगा हूँ


बेनूर हूँ


बेवज़ह का गुरूर हूँ


नापाक हूँ


बेजान हूँ


समझ नही आता


जागते ही मैं इतना बदल कैसे गया


ज़माने के लिए।





Monday, July 21, 2008

झांकता चाँद


किसी के इंतज़ार में नींद को भोंहों पर बेठा रखा था
तब
कल रात मेरे कमरे में एक जुगनू आया ।
कुछ कहा नहीं,
बस चुपचाप था।
चंद लम्हे बीताकर लौट गया ।
रौशनी वो अपनी, संग ले गया,
अब मैं अकेला था
चाँद खिड़की से झांक रहा था।
आशीष..................